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क्या है 1932 का खतियान, जिसपर झारखंड में मचा है बवाल

क्या है 1932 का खतियान, जिसपर झारखंड में मचा है बवाल

Posted at: Mar 1 , 2022 by Swadeshvaani
क्या है 1932 का खतियान, जिसपर झारखंड में मचा है बवाल

रांची- झारखंड सरकार के लिए प्रदेश के लोगों द्वारा  उठाये गये स्थानीयनीति 1932 के खतियानधारियों को नियुक्ति में प्राथमिकता की मांग गले की हड्डी बनता जा रहा है। सरकार के लिए यह यक्ष प्रश्न बन गया है की इस मांग को कैसे और किस रुप मे स्वीकार करे। यदि सरकार ने इस मांग को स्वीकार कर लिए तो फिर अन्य लोगों के प्रतिकार का सामना करना पड़ेगा और सरकार सकंट में घिर जायेगी। राज्य में झामुमो के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार चल रही है। महागठबंधन में कांग्रेस और राजद भी शामिल है। तीनों दल में हिन्दी भाषाई लोगों की संख्या अधिक है। हाल ही में प्रदेश मे नयी नियुक्ति नियमावली में हिन्दी समेत क्षेत्रीय भाषा हटाने जाने पर लोग आंदोलित है। अब जब सरकार ने 1932 के खतियानधारियों की मांग पर बिचार करने की बात कही है त लोगों में हताशा और निराशा देखा जा रहा है। झारखंड में लाखों लाख लोग पिछले कई दशकों  से रहते आ रहा हैं। पर वे खतियानधारियों नही है। हजारों की संख्या मे आदिवासी और सरना घर्म के लोग जिनके पास भी खतियान  नही है। झारखंड में पचास वर्ष  से अधिक समय से सर्वे नही कराया गया है।


हिन्दीभाषी लोग अपने नेता, विधायक और मंत्रालयों को घेरना आरम्भ कर दिया है। पक्ष और विपक्ष के राजनेता अभी से मुंह छुपाना आरम्भ कर दिया है। मामला दिलचस्प बन गया है यदि इस पर उन्होने हामी भरी तो एक बड़ा वर्ग नाराज  हो जायेगा, उनकी कुर्सी को भी खतरा हो जायेगा और विरोध किया तो  उन्हें प्रतिकार का सामना करना होगा। 1932 के संशोधन पर यहां बड़े वर्ग न घर के रहेगें न घाट के ।झारखंड प्रदेश भाजपा के विधायक और बड़े छोटे नेताओं की हालत त और खराब हो रही है। उन्होने मौन घारण कर लिया है। मालुम हो की प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री  बाबूलाल मरांडी  की सरकार भी इन्ही डोमिसाईल नीति पर गिर गयी थी। भाजपा को जोरदार विरोध का सामना करना पड़ा था।अब यही मुद्दा सरकार के समक्ष विवशता की  दीवार बन गयी है।

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