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आदिवासी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ा है झारखंड का राजकीय फूल पलाश

आदिवासी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ा है झारखंड का राजकीय फूल पलाश

Posted at: Mar 7 , 2021 by Swadeshvaani
शिकारीपाड़ा(दुमका)। बसंत के चढ़ते ही पलाश के पेड़ों पर नारंगी रंग के फूल झूमने लगे हैं। भले ही पलाश वृक्ष की लकड़ी की कोई खास अहमियत नहीं हो, लेकिन आदिवासी बालाओं के जुड़े में सजने वाला झारखंड का राजकीय फूल पलाश की गरिमा खास है। पलाश फूल का आदिवासी संस्कृति और सभ्यता से भी गहरा लगाव है। सांस्कृतिक कार्यक्रम समेत विभिन्न आयोजनों में भी इस फूल की महत्ता है। हालांकि आदिवासी समुदाय के बीच सखुआ फूल की अहमियत सबसे खास है। सखुआ के फूल से पूजा और विभिन्न अनुष्ठान करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आदिवासी समुदाय फाल्गुन में होली खेलते हैं जिसे बाहा कहा जाता है। खास बात यह है कि इस पर्व में कृत्रिम रंगों का उपयोग नहीं किया जाता है। आदिवासी समुदाय के लोग बाहा में सादा पानी ही एक दूसरे पर डालकर होली मनाते हैं। जिस तरह से होली में फगुआ गाने का रिवाज है उसी प्रकार बाहा में भी सांस्कृतिक आयोजन व नाच गान की विशेष परंपरा है। इसके लिए विशेष गीत भी गाए जाते है। दूसरी ओर पर्यावरण व जल संरक्षण के प्रेमियों और आदिवासी समुदाय से अलग दूसरे समुदाय के लोगों ने प्राकृतिक तरीके से होली मनाने की परंपरा की शुरुआत की गई है, जो बाहा की परंपरा और मान्यताओं से बिलकुल अलग है। होली में सादे पानी में पलाश का फूल डालकर रात भर उसे फुलाया जाता है उससे सुबह में होली खेली जाती है। आधुनिक समय में इस पर्व को लोग पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़कर देखते हैं क्योंकि इसमें रंग का इस्तेमाल नहीं होता है और पानी की भी बचत होती है। बसंत के चढ़ते ही पलाश के पेड़ों पर आए फूल, झारखंड का राजकीय फूल पलाश का खास महत्व है। महिलाएं पलाश के फूल को जुड़े में लगाती है।


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